Fashion Era

Tuesday, 9 January 2018

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   ''कहते हे उसूलों पे दुनिया टिकती है ,''परन्तु क्या वो उसूल जो सभी प्रकार से सामान है ,मानसिकता बो हे जिसमे हर व्यक्ति को कुछ अवधारणा हे तो कुछ विचार अलग -अगल हे मानो की जिसमे वह सभी सह रहे हो ''परन्तु वह सहता नहीं है ,बल्कि दुसरो को इस हद तक परेशान कर देता है। ''





   '' जहाँ शब्दो ं के बाण (व्यंग )भी बहुत कुछ कर देते है। जो शब्दो के व्यंग भी तो एक ऐसे आग लगा देने या कहे तो सीधे शब्दो ं मनुष्य के अंदर उथल -पुथल माचा देते है ,वही से ऐसी ही कुछ शब्द मानसिकता को उत्तेजित (बढ़ा )कर देते हे जो दृश्य वो आपने मस्तिस्क में बना लेता है। ,जो वह इस मानसिकता को जन्म देता है ;फिर क्या शुरू हो जाती है एक विचार जो एक सोच जो समाज बदलने ,का काम कर सकती है। वही अगर सोच को समय के साथ बदला न जाये तो न जाने कितने परिवार ,कितने लोगो की भावनाओ ं को आराम से कुचल दिया जाता है। ,वहाँ से आगे न बढ़ाबा ही मानसिकता को एक और न लेजाकर एक खराब ''






                        ''  स्थिति तक पहुँचने का कार्य करता है। ,जहाँ बेटे और बेटी में फर्क नहीं किया जाता है ,फिर क्यों  बेटिओ को रोटी बनाना एवं सभी कामों  को सिखाया जाता है।, 





                      ''किन्तु दूसरी और बेटों को सिर्फ पढाई ही करने को कहा जाता है। ,जबकि दोनों सामान है तो रोटी से लेकर अन्य कार्यो को भी जो घर का है ,उसे बेटो को भी मान ,सम्मान ,मर्यादा दोनों को बराबर सिखाना चाहिए। ,,
                                 

Monday, 8 January 2018

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'' जहाँ आप या हम बात करते है ,कि मानसिकता को बदला जाये तो यह सही है ,किन्तु कुछ चीज़े हो या सोच जो मानसिकता से ग्रसित है उनको बदला इतना सम्भव् नहीं है ,क्यों की ऐसी सोच मानसिकता को बदलना इतना आसान नहीं होता हे किन्तु अगर मानसिकता का इतना ज्यादा रूप से एक विचित्र ही सोच है। जो किसी को भी एक निश्चित नहीं होता है कि वह मानसिकता कहाँ और कैसे पनप रही है ,यह तो सभी प्रकार से एक अवधि का भी पता नहीं है ,पर यह मानसिकता अति कहा से है ,यह मानसिकता सभी को प्रवाभित कर रही है जो ऊ च  -नीच ,छोटा हो या बड़ा सभी रूप से न की पुत्र -पुत्री ,माता -पिता ,समाज उस हर एक सभी रूपों में आपना स्तर फैला चुकी है। ,

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''एक सही रूप से निरूपित मानसिकता जो कि समाज में जीवन यापन कर रहे हर ,एक पुरुष एवं नारी के लिए अनिवार्य है ,किन्तु क्या पुरुष इस मानसिकता का शिकार होते है। किन्तु कुछ रूपों में परन्तु नारी को तो हर एक जगह ही नहीं एक छोटी- सी बातो पर भी उसको इसी ही नहीं न जाने कितनी वेवजह की शिकार हो जाती जिन मुद्दों की कोई कोई वजह ही नहीं होती है।'' परन्तु फिर भी उनको कोई न कोई वजह  को समाज  को मिल ही जाती है। कही कहते है।लड़कियों को अपनी सीमा पार नहीं करनी चाहिए ,तो कही पहनावे (वस्र )कपड़ों को लेकर कि ये कपड़े मत पहनो क्या ये मानसिकता ही तो है और क्या ये समाज या कह दे की वो कुछ लोग जो दुसरो की तरक्की या वैकल्पिक वस्तुओं को देखकर एक ख़राब(विकृत )  सोच को उन लोगो के प्रति (लिए )रखते है। यह भी एक मानसिकता का ही उदहारण है। ,जो की समाज को भीतर से खोखला करता जा रहा है ,जो की मानसिकता के कारण ही यह सब होता जा रहा है। ,जो इस सामाज को मानसिकता का शिकार कर रहा है ,,जिससे की सभी वेवजह की बातो से लेकर और मुद्दों को बढ़ाबा मिल रहा है। 

Saturday, 6 January 2018

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   →  मानसिकता को वैकल्पिक विषय का रूप या नाम नहीं दे सकते है,परन्तु मानसिकता निजी जीवन ही नहीं वरन सभी रूपों में हर एक व्यक्ति के जीवन में उथल -पुथल की स्तिथि को एक ''सम्पूर्ण ''रूप से विकसित कर , देता है।''हर एकसमय एवं स्थिति में मानसिकता की परस्पर परीस्थिति ही पतन का परिचायक बनती है। ''जीवन के हर पहलु कोइतना प्रभावितअर्थात  पुरुष एवं नारी दोनों को ही प्रभावित ,करता है। , जिसके फलस्वरूप जब सभी रूप एवं अन्य चरणों में भी मानसिकता का ही प्रभाव अपना स्वरूप फैला रहा है ,किसी की विकृत मानसिकता (सोच )तो एक विकृत प्रवृत्ति एवं इसी में मानसिक क्षमता को ओर भी दुर्बल कर   रहा है। ; वही अगर मानसिकता की तुलना भी कि जाए तो इसका केवल कोई निष्कर्ष   निकल पाएगा। ,,

Thursday, 4 January 2018

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  •     जहाँ आज श ह री इलाकों (क्षेत्रों )में तो कोई ज्यादा तोर पर इस मानसिकता से लोग प्रभावित तो नहीं हे पर जो लोग कुछ काम तो नहीं  बल्कि सभी को परेशानी और पीड़ा का आभास ही करा ते हे वो कुछ लोग हे अगर सही रूप से देखा जाये तो गाँव में तो बहुत ही अधिक रूप से सभी को परेशानी होती हे न तो गाँव में कोई जागरूक होता हे इसी से हम पूरा पता चलता हे वरन क्यों की यही से तो मान   सिकता  को नापा जा सकता है। ''किन्तु गाँवों में जो सोच (मानसिकता )विकार आज भी है ;तो शिक्षा की कमी कह सकते है। ''किन्तु गाँव ों के लोग तो  शिक्षा को भी मान्यता अधिक नहीं दे पाते है ''क्यों की वो कहते पैसा ही सबकुछ है क्या यह सही हे हम जिस समाज में रहते हे वहां कुछ तो हमारे पास होना आवशयक होता हे ''परन्तु इस समाज की ये एक रूढ़ि वादी मानसिकता की लड़कियों को तो चूल्हा -चौका ही सम्भालना हे ,, इसी मानसिकता से आज भी ऐंसे क्षेत्र "(गाँव )है, जहा ही ऐंसी मानसिकता है ,' 




















Wednesday, 3 January 2018

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मानसिकता को हम और भी विभिन्न रूप से भी है किन्तु मानसिकता एक विकार या बीमारी की उत्पति का एक मूल प्रकार है ,जो की ''एक मनुष्य के अंदर मन को झकझोर कर रख देता है ;यह विविन्न प्रकार की तो नहीं है ;''किन्तु मानसिकता को उत्पन्न तो कोई नहीं करता है। किन्तु एक नजरिये से देखा जाये तो हम एक परिकल्पना तो नहीं कर सकते हे किन्तु एक मनुष्य के भीतर बहुत से प्रकार के ऐसे कुछ विकार होते है जिन्हें हम शाररिक विकार का नाम दे सकते है। किन्तु मानसिकता जो की एक प्रभाव कारी विकार है ,यह किसी डॉक्टर के पास जाने या किसी  वैध  या  नीम हकीमो के पास जाकर ईलाज (उपचार )या झाड़ -फूंक कारवाने से समाप्त नहीं होता है यह तो केवल एक विकार है या नहीं यह तो कह पानाउचित नहीं होगा ''''आज समाज किया जो पिछड़ी सोच के लोग आज भी इस आधुनिक

संसार में भी अपना सिक्का (अधिपत्य )जमाना चाहते है।                              ⟳⟳⟳⟳